Mughal King Jahangir Death on October 28 1627 28 अक्टूबर 1627 के दिन मुग़ल बादशाह जहांगीर की वफ़ात हुई। जहांगीर अपने आखरी दिनों में बहुत बीमार हो गये थे जबकि उनकी उम्र 58 साल ही थी। अपनी बीमारी ठीक करने के लिए महल छोड़कर शांत इलाकों की ओर रुख किया क़ाबुल से कश्मीर के तरफ चले गये। कश्मीर की सख़्त सर्दी जहांगीर से बर्दाश्त नही हुई वापस लाहौर का रुख किया लेकिन सफर में ही सराय सादाबाद में जहांगीर का इंतेक़ाल हो गया। कश्मीर के बगसर फोर्ट में उन्हें दफन कर दिया गया। बाद में जब शाहदरा बाग लाहौर में उनके बेटे खुर्रम यानी शाहजहां ने एक खूबसूरत मक़बरे की तामीर का हुक्म दिया। जहांगीर के मकबरे की तामीर पूरी हो गयी जुमा के दिन, 12 नवंबर 1627 को वापस जहाँगीर की कब्र को कश्मीर से लाहौर लाया गया और इसी मक़बरे में फिर से दफन किया गया। जहांगीर के मौत के बाद खुर्रम (शाहजहां) अगले मुग़ल बादशाह बने।
Muslim Ruler Changej Khan's Grandson Barek khan :- महान मंगोल शासक चंगेज़ खान का पोता शहज़ादा बरके ख़ान एक दिन बाज़ार से गुज़र रहा था। उसने देखा कि एक बुज़ुर्ग जिसकी दाढ़ी है, वह सो रहा है और बराबर में एक कुत्ता भी सो रहा है, शहज़ादे ने सवारी से उतर कर शरारत की और बुज़ुर्ग के चेहरे पर अपना पैर रख कर खड़ा हो गया। दाढ़ी देख कर हिकारत से बोला :- "बता तू अच्छा या यह कुत्ता अच्छा"? बुज़ुर्ग ने बड़े तपाक से जवाब दिया कि अगर मेरी मौत ईमान पर हुई तो मै अच्छा; वर्ना यह कुत्ता अच्छा..! यह जवाब सुनकर शहज़ादे के साथ आये खड़े हुए लोगों में सुकूत तारी हो गया, बरके ख़ान के पैर में लरज़ा तारी हो गया। उसने पैर हटा लिया और बुज़ुर्ग को बा इज़्ज़त खड़ा करके पूछा, यह ईमान क्या चीज़ है ? बुज़ुर्ग ने कहा कि यह वह दौलत है जिसे न तुम्हारा दादा लूट सका और न यह तुम्हारे हाथ आएगी, चाहे तुम सौ साल हुकूमत कर लो। शहज़ादे ने कहा लेकिन मुझे वह चाहिये। बुज़ुर्ग ने कहा कि अभी आप इस ईमान की दौलत को नही संभाल सकते। शहज़ादे ने अपने हाथ से अंगूठी निकाल कर दी और बोला कि जब मै बादशाह बनूंगा तब आप...
Kya Shivaji Maharaj Muslim virodhi the? शिवाजी, जनता में इसलिए लोकप्रिय नहीं थे क्योंकि वे मुस्लिम विरोधी थे या वे ब्राह्मणों या गायों की पूजा करते थे. वे जनता के प्रिय इसलिए थे क्योंकि उन्होंने किसानों पर लगान और अन्य करों का भार कम किया था। शिवाजी के प्रशासनिक तंत्र का चेहरा मानवीय था और वो धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता था. सैनिक और प्रशासनिक पदों पर भर्ती में शिवाजी धर्म को कोई महत्व नहीं देते थे. उनकी सेना के एक तिहाई सैनिक मुसलमान थे. उनकी जलसेना का प्रमुख सिद्दी संबल नाम का मुसलमान था और उसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम सिद्दी थे। शिवाजी ने स्थानीय हिंदू राजाओं के साथ ही औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ भी लड़ाइयां लड़ीं. दिलचस्प बात यह है कि शिवाजी की सेना से भिड़ने वाली औरंगज़ेब की सेना का नेतृत्व मिर्ज़ा राजा जयसिंह के हाथ में था, जो कि राजपूत थे और औरंगज़ेब के राजदरबार में उच्च अधिकारी थे। जब शिवाजी आगरा के किले में नज़रबंद थे तब क़ैद से निकल भागने में जिन दो व्यक्तियों ने उनकी मदद की थी, उनमें से एक मुसलमान था जिसका नाम मदारी मेहतर था. शिवाजी के गुप्तचर मामलों के सचिव मौलाना है...
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